कवि लोचन प्रसाद पांडेय का अवदान

बाबू श्याम सुंदर दास के अनुसार ‘लोचन प्रसाद जी का हृदय देश प्रेम से ओतप्रोत है।“ प्रयाग दत्त शुक्ल स्मरण दिलाते हैं कि 1906 में कोलकाता कांग्रेस के अध्यक्ष दादा भाई नौरोजी ने जब “स्वराज्य” का लक्ष्य घोषित किया तब पांडे जी अपने पिता के साथ उस कांग्रेस में सम्मिलित थे। यह मात्र सुखद संयोग ही नहीं था बल्कि लोचन प्रसाद जी के प्रबलतर एवं प्रगाढ़तर होते राष्ट्र प्रेम की अभिव्यक्ति थी कि 1939 के त्रिपुरी कांग्रेस अधिवेशन में उनके द्वारा रचित स्वागत गान गुंजायमान हुआ। पांडे जी की रचनाओं में स्वर्णिम अतीत की सुखद स्मृतियों एवं दुखद वर्तमान परिस्थितियों की दारुण पीड़ाओं दोनों के दर्शन होते हैं। आत्म-गौरव एवं स्वाभिमान को जागृत करने के ध्येय से बारंबार अतीत गौरव का सोद्देश्य गान उनकी रचनाओं की विशेषता है।लोचन प्रसाद जी की रचनाओं में सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन की चाह (स्नेहलता)आधुनिक वैज्ञानिक शिक्षा के प्रसार की ललक, स्वदेशी के प्रति आग्रह, धनी निर्धन के मध्य बढ़ते अंतर को मिटाने की आकांक्षा, नैतिकता, स्वावलंबन एवं चारित्रिक विकास के प्रति आग्रह जैसी प्रवृत्तियां बारंबार परिलक्षित होती हैं।
1857 का स्वाधीनता संग्राम भारतीय नवजागरण का प्रथम चरण है एवं 17 वीं से 19 वीं शताब्दी में हुए साम्राज्यवाद विरोधी जनविद्रोह से अपरिहार्य रुप से जुड़ा है। हिंदी नवजागरण को भी इसी परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता है। हिंदी नवजागरण को मध्य युग से संबंधित करना उसे पुनरुत्थानवाद में सीमित एवं संकुचित करना है। हिंदी नवजागरण के प्रतिनिधि कवियों में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाले लोचन प्रसाद जी की रचनाओं का अध्ययन इसी दृष्टिकोण से किया जाना चाहिए।
डॉक्टर विनय मोहन शर्मा के मतानुसार पाण्डेयजी की समस्त रचनाओं में आत्म-गौरव, स्वदेश एवं स्वभाषा का अनुराग बड़ा प्रबल था। लोचन प्रसाद हिंदी भाषा की सर्वस्वीकार्यता एवं बहुव्यापकता में निहित राष्ट्र को एक सूत्रबद्ध करने की शक्ति से परिचित थे एवं उन्होंने हिंदी भाषा में न केवल हर विषय में लिखे जाने पर बल दिया अपितु स्वयं इसका प्रायोगिक प्रदर्शन भी किया।
आचार्य नंददुलारे वाजपेयी ने लिखा है-पाण्डेय जी मूलतः पंडित कवि हैं। उनके काव्य में पौराणिकता की छाया भी है। ऐतिहासिक- पौराणिक विषयों का आधुनिक समाजोपयोगी प्रस्तुतिकरण लोचन प्रसाद जी की एक अन्य विशेषता है। मेवाड़ गाथा जैसा कि इसे समझा जाता रहा है खंडकाव्य नहीं है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के मत में इस की रचनाएं नंददास की रासपंचाध्यायी के ढंग पर लिखी गई हैं। मंगलदेव शास्त्री के मत में मेवाड़ गाथा हजारों युवकों के राष्ट्रधर्म की पोथी बन गई थी। हरिऔध के अनुसार मेवाड़ गाथा की रचना बड़ी ही ओजस्विनी एवं हृदयोल्लसिनी है। इसके भाव बड़े ही अनूठे एवं विमोहक हैं। आपने इसकी रचना करके भाषा को गौरवमयी बनाया है। महापुरुषों की प्रेरणास्पद जीवन गाथाओं का प्रस्तुतिकरण पांडे जी ने पद्य एवं गद्य में भी बहुलता से किया है। “कर्मवीर मिस्टर गांधी” बापू पर लिखी गई सर्वप्रथम हिंदी कविता कही जा सकती है। लोचन प्रसाद ने 1914 में मिस्टर एम के गांधी को राष्ट्रपिता बनते देख लिया था। यह उनकी दूर दृष्टि थी।
रामनरेश त्रिपाठी के अनुसार पांडेय जी ने अपने जन्म प्रांत छत्तीसगढ़ के प्राचीन साहित्य और गौरव गाथा की खोज करने में अथक परिश्रम किया है। पुरातत्व एवं इतिहासविद् लोचन प्रसाद पांडेय की छाप महानदी एवं छत्तीसगढ़ पर केंद्रित उनकी कविताओं में स्पष्ट देखी जा सकती है। लोचन प्रसाद जी के प्रथम जीवनीकार प्यारेलाल गुप्त का अभिमत है कि छत्तीसगढ़ पांडेय जी की जन्मभूमि थी इसलिए छत्तीसगढ़ को प्रत्येक दृष्टि से उन्नत करना आपने अपने जीवन का एक लक्ष्य बना लिया था। पुस्तकालय, पाठशाला, अन्नागार एवं सेवा समाज तथा छत्तीसगढ़ गौरव प्रचार मंडली की अपने जन्म ग्राम बालपुर में स्थापना उन्नत छत्तीसगढ़ बनाने के लोचन प्रसाद जी के स्वप्न की क्रियात्मक( एवं प्रतीकात्मक भी ) परिणति कही जा सकती है। छत्तीसगढ़ को प्रबल और सबल बनाने का एक अन्य माध्यम था, छत्तीसगढ़ी भाषा में लेखन। लोचन प्रसाद जी की छत्तीसगढ़ी कविताएं काल निर्धारण के विवादों में न पड़ते हुए मूल्यांकन करने पर निश्चित ही छत्तीसगढ़ी की प्रारंभिक काव्य रचनाएं हैं। आधुनिक छत्तीसगढ़ राज्य की अवधारणा का प्रथम प्रवर्तन करने में लोचन प्रसाद पांडेय अपने अनुज एवं छत्तीसगढ़ी के प्रथम उपन्यास “हीरू के कहिनी” के रचयिता बंशीधर पांडेय के साथ खड़े नजर आते हैं। आचार्य नंददुलारे वाजपेई ने मैथिलीशरण- सियारामशरण की जोड़ी की तुलना लोचन- मुकुट की जोड़ी से की है। किंतु यदि छत्तीसगढ़ प्रांत एवं छत्तीसगढ़ी भाषा को केंद्र में रखकर विचार करें तो लोचन- बंशी की समेकित छवि ही उभरकर सामने आती है। डॉ विश्वंभर नाथ उपाध्याय जी ने पांडेय जी के छत्तीसगढ़ प्रेम की एक अत्यंत महत्वपूर्ण विशेषता को रेखांकित किया है। उनके अनुसार लोचन प्रसाद जी ने जो छत्तीसगढ़ की प्रशंसा की है उसमें कहीं भी संकीर्णता अथवा मलिनता नहीं आई है, यह प्रशंसा की बात है।
महानदी का प्रवाह छत्तीसगढ़ में उड़ीसा की तरल सरल संस्कृति का संगीत लिए प्रविष्ट होता है। उड़ीसा की सीमा पर स्थित बालपुर ग्राम सांस्कृतिक वैविध्य एवं समेकन का आदर्श उदाहरण है। यही कारण है कि उड़िया कथा पर आधारित प्रेम प्रधान कविता “केदार गौरी” का जन्म होता है। राधानाथ एवं रायबहादुर मधुसूदन की उड़िया कविता “जीवन चिंता” के रूप में अनूदित होती है एवं उड़िया भाषा में विरचित “महानदी” खंड काव्य पर लोचन प्रसाद जी को बामंडा नरेश सच्चिदानंद त्रिभुवन देव द्वारा काव्य विनोद की उपाधि से विभूषित किया जाता है। अधिकांश द्विवेदी युगीन कवियों की भांति एवं अपने अन्य सहोदरों की भांति भी लोचन प्रसाद पांडेय बहुभाषाविद थे एवं हिंदी अंग्रेजी उड़िया बांग्ला संस्कृत एवं छत्तीसगढ़ी पर उनका समानाधिकार था। “ प्रशस्तिकृतः कवयः” संस्कृत भाषा पर उनके अधिकार को प्रदर्शित करती है।
द्विवेदी युगीन रचनाकारों में इतर भाषा के उत्कृष्ट साहित्य को अनूदित कर हिंदी भाषा को समृद्ध करने का आग्रह देखा जाता है। पांडेय जी ने भी उड़िया के अतिरिक्त बांग्ला ( नवाब सिराजुद्दौला की पदच्युति की मंत्रणा ) अंग्रेजी( सुखी बालक, माता का विलाप ) तथा संस्कृत (रघुवंश सार) जैसे उच्च कोटि के अनुवाद किए।
मृगी दुःखमोचन पांडेय जी की सबसे प्रसिद्ध रचना है एवं आलोचकों द्वारा बारंबार उद्धृत की जाती रही है। संभवत है इसका कारण आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा हिंदी साहित्य के इतिहास में इसका प्रशंसात्मक उल्लेख है। आचार्य शुक्ल के अनुसार – मृगी दुःखमोचन में इन्होंने खड़ी बोली के सवैयों में एक मृगी की अत्यंत दारुण परिस्थिति का विवरण सरस भाषा में किया है जिससे पशुओं तक पहुंचने वाली इनकी व्यापक और सर्वभूत दयापूर्ण काव्य दृष्टि का पता चलता है। इनका ह्रदय कहीं-कहीं पेड़-पौधों तक की दशा का मार्मिक अनुभव करता पाया जाता है। यह भावुकता इनकी अपनी है। भाषा की गद्यवत सीधी सरल गति उस रचना प्रवृत्ति का पता देती है जो द्विवेदी जी के प्रभाव से उत्पन्न हुई है। संभवत मृगी दुःखमोचन जैसी कविताओं के आधार पर सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने कहा था – पंडित रामनरेश त्रिपाठी पंडित रूप नारायण पाण्डेय,श्रीयुत गोपालशरण सिंह, पंडित लोचन प्रसाद पांडेय आदि कवियों की कोई कोई रचनाएं उच्च कोटि की हिंदी साहित्य की स्थायी संपत्ति नारिकेल फल की तरह अनंत सलिल सिक्त और मधुर हुई हैं।
छंद एवं तुक के प्रयोग के संदर्भ में पांडेय जी का मैथिलीशरण गुप्त एवं महावीर प्रसाद द्विवेदी से विचार वैभिन्य था। उन्होंने इंदु के जुलाई 1915 के अंक में लिखा- उद्गारों के प्रवाह को छंद बंधन से स्वच्छंद कर हमें उसके अनुसार वाक्य और भाव को संकुचित एवं वर्धित करना चाहिए। तुक के विषय में मुझे इतना ही कहना है कि जैसे संगीत सुरावट का बाधक ताल है वैसे ही काव्य में तुक नियम भी बाधक हैं। पांडेय जी ने अपनी काव्य भाषा को अपने तद्विषयक विचारों के अनुकूल ढाला। जब आचार्य नंददुलारे वाजपेई लिखते हैं – गुप्त जी और द्विवेदी जी की उस समय की रचनाओं की अपेक्षा पांडेय जी की रचनाएं फिर भी अधिक स्वछंद थीं- तब उनका संकेत पांडेय जी की काव्य भाषा की स्वच्छंदता की ओर अधिक जान पड़ता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लिखा है कि पांडेय जी की रचनाओं में खड़ी बोली का वैसा स्वच्छ एवं निखरा रूप नहीं मिलता जैसा गुप्त जी की उस समय की रचनाओं में मिलता है। यदि शुक्ल जी का आकलन सही है तो यह कहना समीचीन होगा कि पांडेय जी एवं गुप्त जी की भाषा का यह अंतर सिद्धांतजन्य था क्षमताजन्य नहीं।
डॉक्टर विश्वम्भर नाथ उपाध्याय ने पांडेय जी की काव्य भाषा का सुंदर विश्लेषण किया है। उनके अनुसार पांडेय जी में भावगत या अनुभूतिगत मौलिकता थी। पांडेय जी ने कविता में कई विषयों को छूकर काव्य भाषा का निर्माण किया था। पांडेय जी ने जन भाषा के भदेसपन को झाड़- पोंछ कर काव्यभाषा रची, किंतु उसमें जो मिठास और जीवंतता है, बोलचालपन है, यह लोकप्रचलित खड़ी बोली से ही आया है। बोलती हुई भाषा वही लिख सकता है जो अपने भीतर के पांडित्य या तत्समीकरण को सचेत छोड़कर पृथक रखे, उसे कविता पर लदने न दे। श्री लोचन प्रसाद पांडेय की दूरदृष्टि ने यह साफ देख लिया था कि हिंदी का मार्ग जन भाषा के साथ घुलते मिलते हुए चलने में है। यही कारण है कि उनकी कविताओं में खड़ी बोली का बचपन बोलता है- वही भोलापन, सहजता और वही गैर बनावटीपन। भाषागत यह स्वाभाविकता, वक्रोक्ति और बनावट के स्थान पर अपनी बात को बोलता हुआ बनाने की कला पांडेय जी में थी। आज के भावात्मक प्रदूषण के युग में यदि हृदय की शुद्धता की झांकी लेनी हो तो हमें हिंदी के इन भाषा निर्माताओं की रचनाएं पढ़नी चाहिए। पांडेय जी की इस ह्रदय स्पर्शी भाव तरलता का, उनकी कविता भाषा के साथ सीधा संबंध है। भावात्मक जटिलता, भावगत विकार तथा अनुभूतिपरक प्रपंच और पाखंड को सहज भाषा में व्यक्त नहीं किया जा सकता। अतः पांडेय जी की काव्य भाषा एवं भावना में जो पारदर्शिता है वह व्यक्तिगत भी है और अभिव्यक्तिगत भी। इसी कारण उनकी मृगी दुःखमोचन जैसी रचनाएं आधुनिक विषय जाल ग्रस्त मानव को ऐसी लगती हैं जैसे वह सभ्यता के बचपन में पहुंचकर पुनः निश्छलताओं में निमग्न हो रहा हो। यह जो पुनः मानवीकरण या निजता का निश्छलीकरण है यह पांडे जी का कवितात्मक योगदान है और इसके लिए उनका यश अमर रहेगा। क्योंकि आगे की शताब्दियों में मानव समाज का जो अति तकनीकीकरण या विशेषीकरण होगा उससे लोचन प्रसाद पांडेय जैसे कवि का सृजन मुक्तिदाता साबित होगा। कविता और उसमें से पारदर्शी सहज कविता से “शुद्ध कविता” से नहीं शुद्ध भाव की कविता से खोई मानवता को पुनः पुनः पाया जा सकेगा और इस तरह कविता मानवता को बचाए रखने में अपनी भूमिका अदा करती रहेगी।
डॉक्टर बलदेव, लोचन प्रसाद जी की प्रयोगधर्मिता की चर्चा करते हुए लिखते हैं- आनंद कादंबिनी 1907 की विज्ञप्ति के अनुसार पांडेय जी ने खड़ी बोली में पहली बार सॉनेट का प्रयोग किया था जिसका शीर्षक था – घर। सॉनेट पर टिप्पणी लिखते हुए पांडेय जी ने विषय की एकसूत्रता पर बल दिया है। वे लिखते हैं- हिंदी में चतुर्दशी पद्य अर्थात सॉनेट का विषय एक ही हो दो या भिन्न-भिन्न विषयों का प्रतिपादन एक ही सॉनेट में नहीं किया जा सकता। (प्रभा मई 1913 पृष्ठ 109 )बाद में उन्होंने उक्त सॉनेट को अपना घर शीर्षक से आरंभिक पंक्तियों के शब्दों में कुछ फेर बदल कर प्लवंगम छंद में लिखकर नीति कविता में संग्रहित किया है। इससे उनकी प्रयोगशीलता का पता चलता है। इसके अतिरिक्त श्मशान एवं बाल्य स्मृति भी लोचन प्रसाद जी के अन्य सॉनेट हैं। रामेश्वर शुक्ल अंचल ने भी हिंदी में सॉनेट के सर्वप्रथम प्रयोग का श्रेय लोचन प्रसाद पांडेय को दिया है। सॉनेट की चर्चा होने पर श्री त्रिलोचन शास्त्री एवं श्री देवी प्रसाद वर्मा के सॉनेट की परिभाषा संबंधी पत्र व्यवहार का अनायास ही स्मरण हो आता है जिसमें श्री त्रिलोचन शास्त्री ने स्वीकार किया था कि लोचन प्रसाद पांडेय के सॉनेट पर समीक्षकों का ध्यान नहीं गया था। श्री मुकुटधर पांडेय के अनुसार -भाई साहब मात्रा वृत्तों तो में ही नहीं गण वृत्तों में भी रचना करते थे। पाटलिपुत्र में प्रकाशित अतुकांत गणवृत्तों में लिखी गई रचनाओं की तो धूम मच गई थी। संसार कविता ब्लैंक वर्स में लिखी गई है। विश्वंभरनाथ उपाध्याय सहज गैर बनावटी भाषा का प्रयोग करने में पांडेय जी की तुलना श्रीधर पाठक से करते हैं। लोचन प्रसाद पांडेय के संपादन में प्रकाशित कविता कुसुम माला (1910) ब्रजभाषा की तुलना में खड़ी बोली के सामर्थ्य का उद्घोष करती है चाहे वह मौलिक काव्य हो या अनुवाद काव्य।
नवजागरण के परिप्रेक्ष्य में हिंदी साहित्य की भूमिका की चर्चा करते हुए डॉक्टर प्रभात त्रिपाठी ने इस तथ्य की ओर ध्यानाकर्षण किया है कि किसानों को संगठित करने के लिए जितना अच्छा हिंदी में लिखा गया उतना अन्य भाषाओं में नहीं। बाबू श्यामसुंदर दास के अनुसार पांडेय जी की दृष्टि धनवानों की अपेक्षा निर्धन और परिश्रमी कृषकों पर अधिक रही है। सन 1915 में प्रकाशित कृषक बालसखा तत्कालीन कृषक समाज की गीता कही जा सकती है। कृषि और कृषकों तथा ग्रामीण समाज के विभिन्न पक्षों पर ग्रामीण कृषक कवि पांडेय जी ने( सरल सुबोध भाषा) हिंदी तथा छत्तीसगढ़ी भी मैं खूब लिखा। पंचायत कविता पंचायती राज के आधुनिक स्वरूप को अभिव्यक्ति प्रदान करती जान पड़ती है। कविता कुसुम माला की कृषक कविता जहां भारतीय कृषक का गौरवगान करती है वहीं पद्य पुष्पांजलि की भारतीय कृषक कविता उन परिस्थितियों एवं कारकों की पड़ताल करती है जो आज भी भारतीय कृषक की दुर्दशा हेतु उत्तरदायी हैं।
बाल विनोद (1913)एवं बालिका विनोद (1919) में संग्रहित रचनाएं पांडेय जी को बाल साहित्यकार के रूप में प्रतिष्ठित करने का पर्याप्त आधार बन सकती हैं। बाल मनोविज्ञान की गहरी समझ, संगीतात्मक तथा सरल भाषा एवं शिक्षण सिद्धांतों का सूक्ष्म प्रयोग इन बाल कविताओं की विशेषताएं हैं। बाल साहित्य के क्षेत्र में पांडेय जी की परंपरा के पूर्वजों एवं उत्तराधिकारियों का अध्ययन शोधकर्ताओं के लिए एक रोचक विषय बना रहेगा।
डॉ राजू पांडेय हंडी चौक रायगढ़ छत्तीसगढ़ मोबाइल 98264 06528

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s